Chandigarh में पदोन्नति में नियम कानून की उड़ रही धज्जियां
Chandigarh :Postgraduate Institute of Medical Education and Research (PGIMER) के रेडियोथेरेपी तकनीकी कैडर में आरक्षण रोस्टर, कैडर प्रबंधन और पद संरचना को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।इस संबंध में प्रशासन से जांच और सुधारात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।शिकायत में कहा गया है कि विभाग में पोस्ट-आधारित रोस्टर के बजाय वैकेंसी-आधारित प्रणाली अपनाई जा रही है, जो R.K. Sabharwal v. State of Punjab के निर्णय के विपरीत है।
इसके अलावा, अनारक्षित (UR) पदों को आरक्षित वर्ग में गिनने से आरक्षित वर्ग के लोगो का कैडर मे अति-प्रतिनिधित्व की स्थिति बनने का आरोप है।कुछ आरक्षित पदों को वर्षों तक खाली या ब्लॉक रखने पर भी सवाल उठे हैं—बताया गया है कि रिव्यु मे कुछ पद दुर्भावना पूर्वक करीब 12 वर्षों तक लंबित रखे जा रहे ताकि एक खास वर्ग को लाभ दिया जा सके , जबकि नियमों के अनुसार ऐसी स्थिति में डि-रिजर्वेशन किया जाना चाहिए।

छोटे कैडर नियम का उल्लंघन
यह भी कहा गया है कि छोटे कैडर में पर्याप्त पद संख्या न होने के बावजूद आरक्षण लागू किया जा रहा है, जो न्यायालयीय सिद्धांतों के विपरीत है।
कैडर परिवर्तन और पद संख्या पर सवाल
मामले का एक अहम पहलू यह है कि रेडियोथेरेपी कैडर में शामिल कई वरिष्ठ तकनीकी सहायक मूल रूप से रेडियोलॉजी कैडर के बताए जा रहे हैं, जिन्हें बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के रेडियोथेरेपी कैडर में गिना जा रहा है।साथ ही यह भी आरोप है कि यदि ऐसे कार्मिकों को रेडियोथेरेपी कैडर में शामिल किया गया है, तो कुल स्वीकृत (sanctioned) पदों में वृद्धि के अनुरूप पद संरचना में संशोधन नहीं किया गया।
प्रभाकर कमेटी की अनुशंसा की अनदेखी
प्रतिनिधित्व में यह भी कहा गया है कि कुल स्वीकृत पदों में वृद्धि होने पर पदानुक्रम के अन्य पदों की संख्या में समुचित वृद्धि की जानी चाहिए, जैसा कि Prabhakar Committee द्वारा अनुशंसित है।हालांकि, आरोप है कि इस सिद्धांत का पालन नहीं किया गया, जिससे कैडर संतुलन प्रभावित हो रहा है।
दो विकल्प सुझाए गए
समाधान के तौर पर सुझाव दिया गया है कि या तो संबंधित कर्मचारियों को उनके मूल रेडियोलॉजी कैडर में ही गिना जाए, या फिर 1 मार्च 1992 से अन्य कैडर के सभी अतिरिक्त पद रेडियोथेरेपी के कुल स्वीकृत पद संख्या में जोड़कर उन्हें प्रभाकर कमिटी के अनुशंशा के अनुरुप विधिसम्मत रूप से समायोजित किया जाए।
साथ ही M. Nagaraj v. Union of India के तहत पदोन्नति में आरक्षण लागू करने से पहले आवश्यक मात्रात्मक आंकड़ों के मूल्यांकन की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
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