देश की सुरक्षा से खिलवाड़: पाक जासूस के संपर्क में 15 भारतीय अधिकारी, Test जांच में हुआ सनसनीखेज खुलासा
केंद्रीय Test जांच एजेंसियों ने एक सनसनीखेज खुलासा किया है, जिससे देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच में पता चला है कि सेना, पैरामिलिट्री फोर्स और अन्य सरकारी विभागों के 15 से अधिक अधिकारी एक पाकिस्तानी जासूस के सीधे संपर्क में थे।
ये सभी देश की संवेदनशील और खुफिया जानकारी पाकिस्तान को भेज रहे थे। यह चौंकाने वाला खुलासा सीआरपीएफ के असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर मोती राम जाट की गिरफ्तारी के बाद हुई Test जांच में हुआ है, जिसे तीन महीने पहले ही खुफिया जानकारी साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
Test जांच के दौरान, एजेंसियों को 15 ऐसे फोन नंबरों का पता चला, जिनका उपयोग पाकिस्तानी ऑपरेटिव से संपर्क साधने के लिए किया जा रहा था। इन नंबर्स के कॉल रिकॉर्ड्स और डेटा की गहनता से जांच की गई,
तो यह बात सामने आई कि इनमें से 4 नंबर भारतीय सेना के जवानों के थे, 4 पैरामिलिट्री फोर्स के कर्मियों के और बाकी के 7 नंबर विभिन्न सरकारी विभागों में काम करने वाले अधिकारियों के थे। यह घटना सुरक्षा तंत्र में एक बड़े सेंध की ओर इशारा करती है, जहां देश के भीतर के लोग ही दुश्मन देशों के लिए काम कर रहे थे।

मोती राम जाट की गिरफ्तारी और Test जांच का दायरा
इस पूरे मामले की शुरुआत सीआरपीएफ के असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर मोती राम जाट की गिरफ्तारी से हुई, जिसे 27 मई को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने गिरफ्तार किया था। जाट पर आरोप था कि वह एक पाकिस्तानी ऑपरेटिव, जिसका कोड नेम सलीम अहमद है, को भारत से जुड़ी गोपनीय जानकारी दे रहा था।
यह जानकर और भी हैरानी होती है कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से ठीक पांच दिन पहले तक मोती राम जाट उसी इलाके में सीआरपीएफ बटालियन में तैनात था। हमले से कुछ ही दिन पहले उसे दिल्ली में तैनात किया गया था। उसकी गिरफ्तारी के बाद की गई तकनीकी सर्विलांस और जांच में ही इन 15 अन्य नंबरों का खुलासा हुआ।
जांच में यह भी सामने आया है कि पाकिस्तानी ऑपरेटिव जिस नंबर से मोती राम जाट के संपर्क में था, वह कोलकाता से खरीदा गया था। इस नंबर का सिम एक्टिवेशन ओटीपी भी लाहौर में बैठे जासूस को भेजा गया था।
जिस शख्स ने यह नंबर खरीदा था, वह मूल रूप से कोलकाता का है, जिसने 2007 में एक पाकिस्तानी महिला से शादी की और 2014 में पाकिस्तान में ही बस गया। वह साल में दो बार भारत आता था। यह सब एक संगठित जासूसी रैकेट का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें देश के अंदर के लोग भी शामिल हैं।

पैसे का लेन-देन और जानकारी का खुलासा
सूत्रों ने बताया कि मोती राम जाट को खुफिया जानकारी देने के बदले में नियमित रूप से पैसे दिए जाते थे। पिछले दो सालों में, उसके बैंक अकाउंट में महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, दिल्ली, हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों से 12,000 रुपये की मासिक राशि भेजी गई थी।
यह पैसा उसके बैंक अकाउंट में सीधे ट्रांसफर किया जाता था, जिससे यह साबित होता है कि यह जासूसी का एक सुनियोजित और आर्थिक रूप से पोषित ऑपरेशन था।
जांच में मोती राम जाट ने खुद यह दावा किया है कि सबसे पहले वह चंडीगढ़ के एक टीवी चैनल में काम करने वाली एक पत्रकार के संपर्क में आया था।
इसके बाद, फोन और वीडियो कॉल के जरिए उसकी बातचीत होने लगी, जिसमें उसने कई गोपनीय डॉक्यूमेंट्स भी शेयर किए। बाद में, उसकी बात सीधे एक पाकिस्तानी अधिकारी से होने लगी।
इस दौरान उसने सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, विभिन्न एजेंसियों के केंद्रों से जुड़ी जानकारी और जवानों के मूवमेंट से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएं पाकिस्तानी हैंडलर को साझा कीं।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती
इस घटना ने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती को उजागर किया है। यह दिखाता है कि दुश्मन देश केवल सीमाओं से ही नहीं, बल्कि देश के अंदर भी अपने एजेंट्स के माध्यम से जासूसी कर रहे हैं। इस मामले में न केवल सरकारी कर्मचारी बल्कि सेना और पैरामिलिट्री फोर्स के जवान भी शामिल हैं, जो अपने कर्तव्य के प्रति विश्वासघात कर रहे थे।
यह खुलासा जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता है, लेकिन यह भी दिखाता है कि सुरक्षा संस्थानों को अपनी आंतरिक जांच प्रणाली को और भी मजबूत करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों और देश की सुरक्षा को किसी भी कीमत पर खतरे में न डाला जाए।

इन 15 अधिकारियों की गिरफ्तारी और पूछताछ से और भी कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं, जिससे इस जासूसी रैकेट की पूरी चेन का पर्दाफाश हो पाएगा। इस मामले की आगे की Test जांच से यह साफ हो जाएगा कि ये अधिकारी अकेले काम कर रहे थे या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा थे।

