Supreme Court सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: दिल्ली-एनसीआर में अब नहीं दिखेंगे आवारा कुत्ते?
दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या अब एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर हमलों की लगातार बढ़ती घटनाओं और रेबीज के घातक मामलों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है।
इस गंभीर परिस्थिति पर संज्ञान लेते हुए, Supreme Court सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है, जो इस समस्या का समाधान करने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे 8 सप्ताह के भीतर सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर आश्रयस्थलों में स्थानांतरित करें।

क्यों लिया गया यह कठोर निर्णय?
यह फैसला 28 जुलाई 2025 को दिल्ली के पूठ कलां इलाके में 6 साल की बच्ची की रेबीज से हुई दर्दनाक मौत के बाद Supreme Court सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान पर आधारित है।
जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले को “अत्यंत गंभीर” बताते हुए कहा कि जनहित और लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों और बुजुर्गों को किसी भी कीमत पर रेबीज का शिकार नहीं बनने दिया जाएगा।
कोर्ट ने दिल्ली सरकार, एमसीडी, एनडीएमसी, और नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद के अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से एक कार्ययोजना बनाने और उस पर अमल करने का निर्देश दिया है।
इस आदेश के तहत, इन सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर विशेष रूप से बनाए गए आश्रयस्थलों में रखा जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Supreme Court सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि इन कुत्तों को किसी भी परिस्थिति में सड़कों, कॉलोनियों या सार्वजनिक स्थानों पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा।

आदेश के मुख्य बिंदु और कार्यान्वयन की चुनौतियां
Supreme Court सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं, जिनका पालन करना अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
- आश्रयस्थलों का निर्माण: कोर्ट ने 8 सप्ताह के भीतर कम से कम 5,000 आवारा कुत्तों के लिए आश्रयस्थल बनाने का निर्देश दिया है। इन आश्रयस्थलों में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के लिए पर्याप्त कर्मचारी भी तैनात करने होंगे।
- सीसीटीवी निगरानी: यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी कुत्ता वापस सड़कों पर न छोड़ा जाए, इन आश्रयस्थलों की निगरानी सीसीटीवी कैमरों के जरिए की जाएगी।
- हेल्पलाइन की स्थापना: एक सप्ताह के भीतर एक हेल्पलाइन शुरू करने का निर्देश दिया गया है, जिस पर कुत्तों के काटने की शिकायतें तुरंत दर्ज की जा सकेंगी। शिकायत मिलने के 4 घंटे के भीतर संबंधित कुत्ते को पकड़ना अनिवार्य होगा।
- नियमों की आलोचना: कोर्ट ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम, 2023 के तहत कुत्तों को उसी स्थान पर वापस छोड़ने के नियम को “अव्यवहारिक और तर्कहीन” बताया है। कोर्ट का मानना है कि यह नियम समस्या का समाधान नहीं करता, बल्कि उसे और बढ़ाता है।

पशु अधिकार संगठनों की चिंता और अधिकारियों की प्रतिक्रिया
जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आम जनता के लिए राहत की खबर लेकर आया है, वहीं पशु अधिकार संगठनों ने इस पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। पशु अधिकार संगठन पीईटीए (PETA) ने इस आदेश को “अवैज्ञानिक” और “अप्रभावी” बताया है।
पीईटीए की वरिष्ठ निदेशक डॉ. मिनी अरविंदन का कहना है कि 10 लाख कुत्तों को आश्रयस्थलों में रखना एक अव्यावहारिक कार्य है। इससे कुत्तों में तनाव और क्षेत्रीय विवाद बढ़ सकते हैं। उनका सुझाव है कि समस्या का स्थायी समाधान प्रभावी नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने से ही मिल सकता है।
दूसरी ओर, दिल्ली सरकार के पशुपालन विभाग ने कोर्ट के आदेश का पालन करने की प्रतिबद्धता जताई है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एमसीडी और एनडीएमसी के साथ मिलकर एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि कुत्तों के साथ किसी भी तरह की क्रूरता नहीं होगी।

आगे की राह
दिल्ली में आवारा कुत्तों की आबादी का अनुमानित आंकड़ा लगभग 10 लाख है, जिनमें से केवल 4.7 लाख की ही नसबंदी हो पाई है। इस वर्ष जनवरी से जून तक, 35,000 से अधिक कुत्ते के काटने की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 49 रेबीज के मामले शामिल हैं। इन आंकड़ों से समस्या की भयावहता का पता चलता है।
Supreme Court सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 सप्ताह बाद तय की है, जिसमें अधिकारियों को अपनी प्रगति रिपोर्ट सौंपनी होगी। कोर्ट ने रेबीज वैक्सीन की उपलब्धता और स्टॉक की जानकारी भी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है, ताकि पीड़ितों को तत्काल उपचार मिल सके।
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अधिकारी 8 सप्ताह की इस समय-सीमा के भीतर इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा कर पाते हैं।
यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है, तो यह न केवल दिल्ली-एनसीआर के निवासियों के लिए एक बड़ी राहत होगी, बल्कि यह देश के अन्य हिस्सों के लिए भी एक मॉडल साबित हो सकता है। फिलहाल, इस ऐतिहासिक फैसले ने सड़कों को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक नई उम्मीद जगाई है।

